उम्मीद पे दुनिया क़ायम
                     
                       ~ Sriks (Who else?)

निराशाजनक अखबारों कि सुर्ख़ियों से
न अग्न्यनों के मुरकियों से
अंधे कानून से
न सड़कों पर घूमनेवाले दरिंदों से

आतंकवादियों से
न पढ़े लिखे मति-बंद इंसानों से
मूर्ख नेताओं कि विशेष टिप्पणियों से
न नपुंसक गठ-बंदी सरकार से

ग़रीबी, भुकमरी या बेरोज़गारी से
न घंटों बिजली की कटौती से
हमें गिला है न शिकवा है
इन् गैरों से जो लगते तो हैं अपने से

नाराजगी तो है हमें खुद से
और हम जैसे भावुक और उत्तेजित बहनों और भाइयों से
अपने आप को असहाय या असमर्थ समझ
नाराजगी है इस नासूर व्यवस्था को केवल कोसने से

सीना ठोक औरों को बदलने चल पड़े
खुद के गिरेबां में झाँकने से पहले
इस महान देश कि व्यवस्था बदलने चल पड़े
रोजमर्रे की ज़िन्दगी में या अपनी सोच में लाने से पहले

चलो, पहले छुपाये जाने वाली हर बात को उछालने से
जनता में जागरूकता की एक लहर तो चल पड़ी
गहरी नींद से जागने के संकेत पे और सुबह कि धुंद से
उम्मीद कि एक किरण तो निकल पड़ी

इसी उम्मीद पे और अपने देश के असली संस्कारों के भरोसे
आप सभी को इस चौसंठ्वा गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!!

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