स्वतंत्रता – एक एहसास

आज कि मांग है
सोच में बद्लाव कि
औरों से उम्मीद के पहले
अपने आप में इसे जगाने कि

‘पहले आप’ के तहज़ीब वाले इस देश में
अब गूँज रहा है खुदगर्ज़ी का नारा
“हमारी माँगें पूरी करो” कहते सुनते
प्रदेशों में बट रहा है देश यह सारा

अनेकता में एकता का हमेँ कभी था अभिमान
लेकिन अब धर्म और जाति के तनावों में झुकी है हमारी शान
अपने माँ और बहनोँ कि सुरक्षा से मुँह मोड़े, ज़मीर है सोई
भारत माँ कि लाज बचाने वाला क्या सच्चा है कोई?

अपने देश की रक्षा करना केवल जवानोँ कि नहीं
ज़िम्मेदारी तो हम सब कि है
बुनियादी ज़रूरतों कि ख़्वाहिश
जनता कि यह आस तो कब कि है

बढ़ौती और उन्नति में बड़ा फ़र्क है
इस तृष्णा से अपने आप को बचाना है
देश के आबादी को एक ज़रिया बनाना है
उमंग कि लहर को प्रगति के सैलाब में बदलना है

किसि के नक़ल की हमेँ कया ज़रुरत?
आओ अप्नी कल्पनाओं को एक नयी उड़ान दें
ख़ेल, कला और संस्कृति में
उत्कृष्टता कि एक अपनी पहचान दें

मनाने को स्वंतंत्रता एक “दिवस” मात्र नहीं
वह तो हर पल महसूस करने वाली एक जज़्बात, एक एहसास है
अतुल्य भारत तो है ही – आओ मिलके इसे बनाएँ
एक प्रचंड भारत; एक अखंड भारत

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